मंगलवार, 8 सितंबर 2009

विरोधी ध्रुवों के बीच

जो इंसान हम कविता में बुनते हैं
उसी की तलाश हम सड़कों पर करते हैं
जो आँखें हम कविता में रचते हैं
उन्हीं आंखों को हम गली के मुहाने पर
कोई अनाम सत्य खोजते हुए
देखना चाहते हैं
जो सपने हम गुफाओं में उकेरते हैं
उन्हें हम चिलचिलाती धूप में
जिंदा रखना चाहते हैं
संबंधों की ऊष्मा का पानी
जो उड़ चुका है भाप बनकर
उसीकी भागीरथी हम
जीवन में उतारना चाहते हैं
बर्तनों की असलियत पर
कलई चढा चढा कर
एक चमक पालना चाहते हैं
पेडों की जड़ों में
स्वार्थ का तेजाब डाल डाल कर
उन्हें हरा रखना चाहते हैं
पर्वतों के पांवों को रेत में बदलकर
करना चाहते हैं उन्हींके ऊंचे शिखर
पोखरों में उतरकर
करते हैं समुद्र मंथन

इन विरोधी ध्रुवों के बीच
जो एक खुला मैदान है
वहीं हम
खेलने से हैं बचते
नहीं
कभी भी नहीं
ख़ुद को अपनी ही कसौटी पर कसते ।

शनिवार, 5 सितंबर 2009

दुरमुट

मजदूर के हाथों
रोडी कूटता दुरमुट
फिसल जाता है
हथिया लेता है उसे डॉक्टर
और मोटी सुई बना लेता है
मास्टर के हाथों में
छडी बन जाता हैं दुरमुट
पिता के हाथों आदेश
राजनेता के हाथ में
स्टेनगन होता है दुरमुट
और धर्माचार्य के होंठों पर
काला मन्त्र

अजीब शै है दुरमुट
हाथ बदलते ही शक्ल बदलता है
सुई, छडी, आदेश , काला मन्त्र
या नौकरशाह की
भारी भरकम कलम

कितना अच्छा लगता है
मजदूर के हाथ में ही दुरमुट
समतल करता ज़मीन
उस पर बनता है फर्श
फर्श पर ही टिके रहते हैं पाँव
वहीं से दीखते हैं शहर, कसबे और गाँव

दुरमुट का हाथ बदलना
इतिहास में बार-बार हुई एक दुर्घटना है ।

बुधवार, 2 सितंबर 2009

मेरी राय.....आपकी राय

दिल्ली विश्व विद्यालय छात्र संघ के चुनाव में आदर्श आचार संहिता का उलंघन करने के लिए मुख्य चुनाव अधिकारी ने विभिन्न छात्र घटकों के छह उम्मीदवारों का नामांकन रद्द कर के एक मिसाल कायम की है और छात्रो को यह स्पष्ट संदेश दिया है कि आदर्श आचार संहिता का उलंघन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा । दिल्ली हाई कोर्ट में छात्रों द्वारा लगाई गई गुहार से भी उन्हें कोई रहत नहीं मिली ।
मेरी राय है कि भारत के आम चुनावों में भी हमारे निर्वाचन आयोग को आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले नेताओं के ख़िलाफ़ ऐसे ही सख्त कदम उठा कर राजनेताओं को साफ़ सुथरा चुनाव लड़ने की सीख देनी चाहिए । जब तक चुनावों में धन बल और तन बल ख़त्म नहीं होगा तब तक व्यवस्था से भ्रष्टाचार भी ख़त्म नहीं हो सकता। मेरी राय में हमारा चुनाव आयोग अपना काम ठीक से नहीं कर रहा है । आपकी क्या राय है ?

बुधवार, 26 अगस्त 2009

मेरा होना बना रहेगा

अब आप मुझे बाहर नहीं कर सकते
मैं न रहूँ
तब भी
मैं रहूँगा
आपके कमरे में
एक किताब बनकर
आपकी मेज़ पर सोया रहूँगा
या आपकी
गाडी की पिछली सीट पर
सेंकता रहूँगा
सर्दियों की धूप
और सुनता रहूँगा
आपकी बातें
या कोई ग़ज़ल
या कोई संगीत की तान
नहीं सुनूंगा खबरें
वे तब भी वही होंगी
जो आज हैं
पर सुनूंगा ज़रूर आपकी बातें
बोलूँगा ज़रूर
आपकी ज़बान पर चढ़कर
आप चाहें भी तो
अपनी ज़बान से
नहीं फेंक सकेंगे
गाडी से बहार
सुनेंगे मेरी बातें
अपनी साँसों के साथ
अब आप मुझे कैसे कर सकते हैं बहार
अपनी दुनिया से .

मायाजाल

मायाजाल
गुफाओं में प्रवेश करना
बहुत मुश्किल होता है
द्वार पर
कई-कई रंगों की लगी सांकलें
प्रवेश रोकती हैं
संभ्रम का प्रभामंडल होता है आसपास
टूटती हैं सांकलें कभी-कभी
फिर मिलते हैं
कई-कई द्वार
कौन सा द्वार
कहां ले जाए
कुछ भी अनुमान नहीं होता पहले से

प्रवेश के बाद भी
कई-कई द्वार
और कई-कई सांकलें

द्वारों की चोखटों के नीचे दबे
स्वप्नों का रंग झलकता है
पकड़ में नहीं आता
स्वप्न-दृश्य
और द्वारों के बीच खुलने लगते हैं
और और द्वार
द्वारों के मायाजाल में फंसा
आदमी क्या करें ?

सोमवार, 27 अप्रैल 2009

मेरी राय........आपकी राय

मेरी राय ..........आपकी राय

हिंदू समाज में विवाह के समय कन्यादान की प्रथा प्रचलित है। कन्यादान पिता हैं तो पिता द्वारा और पिता किसी भी कारण से अनुपस्थित हैं तो भाई या किसी नजदीकी रिश्तेदार द्वारा किया जाता है। यानि कन्यादान विवाह की एक अनिवार्यता है । कन्यादान के साथ पुण्य फल को भी जोड़ा जाता है । मेरी राय में यह एक मध्यकालीन और अतार्तिक प्रथा है । दान की गई वस्तु से तो व्यक्ति का रिश्ता हमेशा के लिये समाप्त हो जाता है, लेकिन बेटी से सम्बन्ध तो जीवन पर्यंत बना रहता है । फिर कन्या कोई वस्तु नहीं है , जिसे दान दिया जा सके । आज के समय में यह प्रथा पिछडी हुई तो है ही , शर्मनाक भी है । इस प्रथा के साथ जुड़े अंधविश्वासों से मुक्ति पाना ज़रूरी है
कानूनी तौर पर इस प्रथा से शायद जल्दी छुटकारा न मिले लेकिन इस के विरोध में जनमत बनाकर इससे मुक्त हुआ जा सकता है । इस सम्बन्ध में आपके क्या राय है ?

मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

वोट देना कानूनन अनिवार्य कर देना चाहिये

मेरी राय में वोट देना कानूनन अनिवार्य कर देना चाहिये और उस कानून में ऐसा
प्रावधान किया जाये कि जो व्यक्ति अपने मतदान के अधिकार का उपयोग ना करे,
उसे दण्डित किया जाये. मिसाल के तौर पर अगर कोई व्यक्ति अपने मतदान के
इलाके में मौजूद होकर भी अकारण मतदान नहीं करता तो उस पर उसकी मासिक आय का
एक प्रतिशत जुर्माना लगाया जाये और अगर उसकी आय शून्य है तो उससे किसी
सामाजिक योजना में एक दिन का श्रमदान करवाया जाये.........

आपकी क्या राय है

शनिवार, 18 अप्रैल 2009

मेरी राय......आपकी राय

मित्रों । यहां मैं किसी एक सामाजिक प्रश्न को लेकर अपनी राय रखूं गा और आप अपनी.
 इस तरह से शायद हम कोई आम राय बना सकते है.

मेरी राय है कि सार्वजनिक स्थानो पर बने सभी अवैध निर्माणों को
हटा देना चाहिये चाहे वे मन्दिर मस्जिद या गुरुद्वारे क्यों न हों 


आप क्या कहते है ?

शुक्रवार, 25 जुलाई 2008

मालूम नहीं

कहा तो था तुमने
ख़त लिखने को
और मैंने
सिर्फ़ शिकायतें दर्ज कीं

कहा तो था तुमने
मिलने को भी कभी
और मैं
रास्तों को
नक्शों में तब्दील करता रहा

कहा तो था तुमने शायद
फोन करना
थोडी शाम ढलने के बाद
और मैं गुमसुम
हवाओं के पर काटता रहा

मालूम नहीं
हर बार
कुछ होना
कुछ और क्यों होता रहा !

मंगलवार, 22 जुलाई 2008

अहम् अस्मि

पहाड़ों की गुफाओं में

भागते चले जाना

अंधे घोड़ों तरह

और शिलाखंडों पर

समय की स्याही से

लिख देना

अपना पैगाम

शताब्दी के नाम

या बिखेर देना रंगों के दरिया

पेड़ की जड़ों में

या भर देना

शून्य को

हज़ार हज़ार सूरजों के लाली बन

या सोख लेना

समुद्र का खारापन

आचमन की मुद्रा में

और धरती की तहों में भर लेना

एक अविजित एहसास

बहुत मामूली से लगने वाले पलों का

आदमियत की अविरल बहती परम्परा में

ख़ुद को पहचानने की कोशिश ही तो है !

सोमवार, 14 जुलाई 2008

यक्ष प्रश्न

अँधेरा जब अंधेरे में ही लिपटा हो
और हमें सूर्य की कल्पना से भी
महरूम कर दिया जाए
तब पृथ्वी के कौन से हिस्से पर
हम अपना पाँव टिका सकते हैं ?

जब जल को वाष्प में बदल कर
फैला दिया जाए पूरे माहौल में
कोहरे की तरह
और नदी को पृथ्वी के नक्शे से ही
मिटा दिया जाए
तो हलक में फंसे शब्दों को
माहौल में पटकने के लिए
जल कहाँ से जुटा सकते हैं ?

जब हवाओं को स्थिर करके
कुछ चट्टानों की तरह
दाल दिया गया हो बंदी-गृहों में
तब गति की तलाश में
भटकती चेतना के वारिस
तरलता कहाँ से पा सकते हैं ?
कल्पना कुंद
माहौल में कोहरा
जल और गति-हीन जीवन चक्र की
धुरी का आप हम क्या अर्थ लगा सकते हैं ?

सोमवार, 7 जुलाई 2008

धर्म

मेरी एक पुरानी कविता

धर्म

धर्म ने हमसे बहुत कुछ लिया है
बदले में
गिद्ध की आँख
हाथी के दांत और
कबूतर का दिल दिया है

रविवार, 6 जुलाई 2008

मेरा प्रथम ब्लॉग

मेरे प्रथम ब्लॉग पर आपका स्वागत है। आशा करता हूँ मेरे सृजन की भूख और अन्वेषण की पहुँच आपको फिर आने के लिए  प्रेरित करेगी।

धन्यवाद।

प्रताप.