सोमवार, 14 जुलाई 2008

यक्ष प्रश्न

अँधेरा जब अंधेरे में ही लिपटा हो
और हमें सूर्य की कल्पना से भी
महरूम कर दिया जाए
तब पृथ्वी के कौन से हिस्से पर
हम अपना पाँव टिका सकते हैं ?

जब जल को वाष्प में बदल कर
फैला दिया जाए पूरे माहौल में
कोहरे की तरह
और नदी को पृथ्वी के नक्शे से ही
मिटा दिया जाए
तो हलक में फंसे शब्दों को
माहौल में पटकने के लिए
जल कहाँ से जुटा सकते हैं ?

जब हवाओं को स्थिर करके
कुछ चट्टानों की तरह
दाल दिया गया हो बंदी-गृहों में
तब गति की तलाश में
भटकती चेतना के वारिस
तरलता कहाँ से पा सकते हैं ?
कल्पना कुंद
माहौल में कोहरा
जल और गति-हीन जीवन चक्र की
धुरी का आप हम क्या अर्थ लगा सकते हैं ?

3 टिप्‍पणियां:

  1. वाकई,कुछ सवाल ऎसे हॆ,जिनका जवाब ढूंढते-ढूंढते पूरा जीवन निकल जाता हॆ,लेकिन सवाल ज्यों के त्यों मॊजूद रहते हॆं.बहुत ही सुंदर रचना.

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  2. कविता सुन्दर है ! लिखते रहिए यहां भी !

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टिप्‍पणी सच्‍चाई का दर्पण है