शुक्रवार, 25 जुलाई 2008

मालूम नहीं

कहा तो था तुमने
ख़त लिखने को
और मैंने
सिर्फ़ शिकायतें दर्ज कीं

कहा तो था तुमने
मिलने को भी कभी
और मैं
रास्तों को
नक्शों में तब्दील करता रहा

कहा तो था तुमने शायद
फोन करना
थोडी शाम ढलने के बाद
और मैं गुमसुम
हवाओं के पर काटता रहा

मालूम नहीं
हर बार
कुछ होना
कुछ और क्यों होता रहा !

5 टिप्‍पणियां:

  1. वाह अच्छी कविता पढवाई आपने ! यदि आप अपने ब्लॉग की सेटिंग्स में सर्च इंजनस को अपना ब्लॉग फालो करने की इजाज़त वाले खाने में हामी भर देगे तो ये इंजनस आपको खोद ही लेंगे और आपकी पोस्ट को तुरंत दिखाने लगेंगे !

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  2. होना वो नहीं होता
    जो मन के कोने में
    छिपा होता है
    होता है वही जो
    मंजूरे खुदा होता है
    या जो राम रचि राखा।

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  3. ब्लॉग जगत में सक्रियता के लिए बधाई ! अब देवनागरी में लिख भर लेने की कमी है ! :)

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टिप्‍पणी सच्‍चाई का दर्पण है